Saturday, 7 April 2012


ऋतुमती हुईं लूएं
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संवादरत हैं संगीत
रगों में
संगीतमय़ी हो गयी है देह

देह -चित्त से शून्य हुआ
चेतना के रथ -
सवार
मन- सितार

बज रहा है
हजारों - हज़ार मीलों दूर.!

ऋतुमती हुईं अशांत लूएं
मेह बरसने के बाद
तृप्त है धरती

मगन है आकाश
अपने ही अनहद नाद !

झुलस  रहे धोरों  से
निकली पगडंडियों पर
शोध रहा हूं शताब्दियों से
जीवन - संगीत
पर
अफसोस  कि
सन्नाटा ही बुनता रहा
जीवन पर्यन्त !!

-मीठेश निर्मोही

1 comment:

  1. ऋतुमती हुईं अशांत लूएं
    मेह बरसने के बाद
    तृप्त है धरती.....सुंदर ,..

    झुलस रहे धोरों से
    निकली पगडंडियों पर
    शोध रहा हूं शताब्दियों से
    जीवन - संगीत
    पर
    अफसोस कि
    सन्नाटा ही बुनता रहा
    जीवन पर्यन्त !!....यह शोध कभी पूरा नहीं होता ,वाकई बहुत सुंदर भाव और शब्द रचित रचना है यह ...शुभकामनाये

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