Saturday, 7 April 2012

 डर

 दहशत उछालता
खुली खिड़की का डर
भीतर तक झांकता है
बंद करो न खिड़की
कौन तुम्हें पालता है
पर
बंद खिड़की का डर
उससे भी है बढ़कर
जान लेवा
जान लेना
.
 - मीठेश निर्मोही 
 
--------------------------

मरुस्थल : दो शब्द चित्र 


( एक )
उगल रहे हैं आग
बदल रहे हैं राग
अपना ही भूगोल
और तस्वीर अपनी
रह - रह कर ठिकाने बदलते हुए
बिखरे - बिफरे
ये धोरे रेत के .

 ( दो )
जेठ की दुपहरी में
उठती हुई लपटों की हाहाकार
मुंह फेर लिया है रोही ने
पल - पल पसरती ही  जा रही हैं चीखें

एक- एक कर
दम तोड़ते जा रहे हैं -
मृग - छौने
और मृग
ज़ार - ज़ार  रो रही है
थूहर .

- मीठेश निर्मोही







 

ऋतुमती हुईं लूएं
===========
संवादरत हैं संगीत
रगों में
संगीतमय़ी हो गयी है देह

देह -चित्त से शून्य हुआ
चेतना के रथ -
सवार
मन- सितार

बज रहा है
हजारों - हज़ार मीलों दूर.!

ऋतुमती हुईं अशांत लूएं
मेह बरसने के बाद
तृप्त है धरती

मगन है आकाश
अपने ही अनहद नाद !

झुलस  रहे धोरों  से
निकली पगडंडियों पर
शोध रहा हूं शताब्दियों से
जीवन - संगीत
पर
अफसोस  कि
सन्नाटा ही बुनता रहा
जीवन पर्यन्त !!

-मीठेश निर्मोही

Sunday, 1 April 2012

प्रभाती गाये जा रही  है माँ


आलस मरोड़
उठ खड़े है धोरे रेत के


मुस्करा रहे है
खेजड़ी और बबूल


चिहुँक उठे है घोंसले
तौल रहे है पंख


छुप गया है
तारा भोर  का


घट्टी संग
प्रभाती गाये जारही है माँ ..!






मीठेश निर्मोही